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आर्यों द्वारा विकसित वर्ण व्यवस्था



 

 

     आर्यों द्वारा विकसित वर्ण व्यवस्था



The -caste -system -developed -by -the -Aryans
The caste system developed by the Aryans

प्राचीन भारत में आर्य समाज द्वारा विकसित वर्ण व्यवस्था प्रारंभ में सामाजिक कार्य-विभाजन पर  आधारित थीकिंतु कालांतर में यह जन्म-आधारित और असमान व्यवस्था में परिवर्तित हो गईजिससे कुछ वर्गों को अछूत मानकर गंभीर सामाजिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

 

वर्ण व्यवस्था का निर्माण

ऋग्वैदिक काल में समाज को मुख्यतःचार वर्णों ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र में विभाजित किया गया। प्रारंभिक अवस्था में यह विभाजन कर्म (कार्य) और गुण के आधार पर था।

ब्राह्मण:- यज्ञशिक्षाधर्म

क्षत्रिय:- शासन और युद्ध

वैश्य:- कृषिपशुपालनव्यापार

शूद्र:- सेवा कार्य

परंतु उत्तर वैदिक काल तक आतेआते यह व्यवस्था जन्म आधारित हो गई और सामाजिक गतिशीलता समाप्त हो गई।

अछूत प्रथा की उत्पत्ति

समाज में कुछ कार्यजैसे मृत पशुओं को उठानाचमड़ा कार्यशवदाहसफाईको अपवित्र” माना गया। इन कार्यों से जुड़े लोगों को वर्ण व्यवस्था से बाहर कर दिया गयाजिन्हें आगे चलकर चांडाल,निषाद आदि कहा गया। यही वर्ग बाद में अछूत कहलाया। अछूतों पर अत्याचार और भेदभाव उन्हें शिक्षा और वेद अध्ययन से वंचित रखा गया मंदिरोंसार्वजनिक कुओं और यज्ञों में प्रवेश निषिद्ध था उनके स्पर्श तक को अपवित्र माना गया बसावट गाँवों से बाहर कर दी जाती थी कठोर दंड और सामाजिक अपमान सहना पड़ता था

ऐतिहासिक मूल्यांकन

यह स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था का यह कठोर रूप आर्यों की मूल अवधारणा नहींबल्कि बाद के सामाजिकधार्मिक विकास का परिणाम था। फिर भीइस व्यवस्था ने समाज में गंभीर असमानता और मानवाधिकार हनन को जन्म दिया। बौद्धजैन और बाद में भक्ति आंदोलन तथा आधुनिक काल में डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे विचारकों ने इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था का विरोध किया और सामाजिक समानता की दिशा में संघर्ष किया।

आर्यों द्वारा रचित वेदपुराण और शास्त्र न तो पूर्णतः काल्पनिक हैं और न ही शुद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का क्रमबद्ध विवरणबल्कि ये ग्रंथ ऐतिहासिक यथार्थदार्शनिक चिंतनप्रतीकात्मक कथाओं और धार्मिक विश्वासों का सम्मिलित रूप हैं।

वेद

वेद (ऋग्वेदयजुर्वेदसामवेदअथर्ववेद) मुख्यतः धार्मिकदार्शनिक और सामाजिक ग्रंथ हैं। इनमें वर्णित यज्ञदेवतासामाजिक जीवनयुद्धनदी-घाटियाँ और जनजातियाँ उस समय के वास्तविक समाज का

 प्रतिबिंब देती हैं। हालाँकि वेद इतिहास ग्रंथ नहीं हैंफिर भी इनमें आर्यों के जीवनअर्थव्यवस्था और संस्कृति के ऐतिहासिक संकेत मिलते हैं।

पुराण

पुराणों में सृष्टिकथादेवदानव युद्धराजवंशों की वंशावलियाँ और अवतार कथाएँ मिलती हैं। इनमें कुछ अंश ऐतिहासिक स्मृति पर आधारित हैं (राजाओं के नामवंश)

जबकि अनेक कथाएँ प्रतीकात्मकरूपकात्मक और धार्मिक कल्पना हैं इसलिए पुराणों को इतिहास नहींबल्कि परंपरागत इतिहासबोध माना जाता है।

शास्त्र (धर्मशास्त्रअर्थशास्त्र आदि)

मनुस्मृतिअर्थशास्त्र जैसे ग्रंथ समाज और शासन के नियमों को दर्शाते हैं। ये उस युग की वास्तविक सामाजिक व्यवस्था और विचारधारा को प्रकट करते हैंपरंतु ये भी नैतिक-नियामक ग्रंथ हैंन कि घटनात्मक इतिहास।

निष्कर्ष

वेदपुराण और शास्त्र काल्पनिक कथाएँ नहीं,शुद्ध इतिहास भी नहीं ,बल्कि वे अपने समय की सामाजिक सच्चाइयोंधार्मिक विश्वासों और दार्शनिक चिंतन का मिश्रित दस्तावेज हैं। आर्यों द्वारा विकसित वर्ण व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य समाज को सुव्यवस्थित करनाकार्यो का विभाजन करना और सामाजिक स्थिरता बनाए रखना था। 

 प्रारंभिक काल में यह व्यवस्था किस प्रकार की ऊँचनीच पर नहींबल्कि कर्मगुण और सामाजिक दायित्वों पर आधारित थी।ऋग्वैदिक काल में आर्य समाज सरल था और विभिन्न कार्यों,धार्मिकसैनिकआर्थिक और सेवात्मक केसुचारु संचालन के लिए समाज को चार प्रमुख वर्णों में बाँटा गया। ब्राह्मणों का कार्य शिक्षायज्ञ और ज्ञान का संरक्षण थाक्षत्रियों का दायित्व शासन और समाज की रक्षा करनावैश्यों का कार्य कृषिपशुपालन और व्यापार द्वारा अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करनाजबकि शूद्रों का उद्देश्य अन्य तीन वर्णों की सेवा करना था। 

 इस प्रकार वर्ण व्यवस्था कार्य-कुशलता और सामाजिक संतुलन की दृष्टि से बनाई गई थी। इसके अतिरिक्तवर्ण व्यवस्था का उद्देश्य समाज में कर्तव्यबोधअनुशासन और परस्पर निर्भरता की भावना विकसित करना थाजिससे सामाजिक संघर्ष कम हों और व्यवस्था बनी रहे। प्रत्येक वर्ण का अपना निश्चित धर्म (कर्तव्य) निर्धारित था।  हालाँकिउत्तर वैदिक काल में यह व्यवस्था जन्म-आधारित और कठोर हो गईजिससे सामाजिक असमानता और भेदभाव उत्पन्न हुआ। यह विकृत रूप वर्ण व्यवस्था के मूल उद्देश्य से भिन्न था। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वर्ण व्यवस्था का मूल उद्देश्य सामाजिक संगठन और व्यवस्था था कि शोषण या अछूत प्रथा की स्थापना।

 

 

 

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