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प्राचीन भारत में धर्म और कानून की अवधारणा

 


 प्राचीन भारत में धर्म और कानून की अवधारणा



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प्राचीन भारत में धर्म और कानून की अवधारणा


प्राचीन भारत की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को समझने के लिए यह जानना अनिवार्य है कि वहाँ कानून से ऊपर धर्म को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। आधुनिक अर्थों में कानून जहाँ लिखित नियमों, दंड और संस्थाओं पर आधारित होता है, वहीं प्राचीन भारत में धर्म एक नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और न्यायिक संहिता था, जो राजा से लेकर सामान्य नागरिक तक सभी पर समान रूप से लागू होता था।

आज के इस ब्लॉग मैं प्राचीन भारत में कानून से ऊपर धर्म की अवधारणाका गहन, तथ्यपूर्ण और अध्ययन प्रस्तुत कर रहा हूँ ,जिसमें वैदिक काल से लेकर मौर्य और गुप्त काल तक धर्म, राज्य और न्याय के संबंध को विस्तार से समझाने की कोशिश कर रहा हूँ ।

धर्म का अर्थ (केवल धर्म नहीं, बल्कि कर्तव्य)

आज धर्मशब्द को प्रायः religion के अर्थ में लिया जाता है, लेकिन प्राचीन भारत में धर्म का अर्थ कहीं अधिक व्यापक था।
धर्म का तात्पर्य था-

1.       कर्तव्य

2.       नैतिकता

3.       सामाजिक उत्तरदायित्व

4.       न्यायपूर्ण आचरण

धर्म वह सिद्धांत था जो बताता था कि कौन-सा कार्य उचित है और कौन-सा अनुचित,चाहे वह राजा करे या सामान्य नागरिक।

वैदिक काल में धर्म और सामाजिक व्यवस्था

वैदिक काल में समाज किसी केंद्रीकृत कानून प्रणाली से नहीं, बल्कि धर्म-संहिताओं से संचालित होता था।
ऋग्वेद और अथर्ववेद में ऋत की अवधारणा मिलती है,जो आगे चलकर धर्म का आधार बनी।

ऋत का अर्थ था

प्रकृति, समाज और नैतिकता का संतुलित क्रम

यदि राजा या समाज इस क्रम का उल्लंघन करता, तो उसे अधार्मिक माना जाता।

धर्म और राजा (राजा भी कानून से ऊपर नहीं)

प्राचीन भारत में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि धर्म का रक्षक माना जाता था। राजा की वैधता इसी बात पर निर्भर करती थी कि वह धर्म के अनुसार शासन कर रहा है या नहीं।

महत्वपूर्ण सिद्धांत था:-

राजा धर्म के अधीन है, धर्म राजा के अधीन नहीं।

यदि राजा अधर्म करता, तो उसे हटाने का नैतिक अधिकार समाज को प्राप्त था,यह अवधारणा आधुनिक कानून का शासन से भी अधिक सख्त थी।

 

धर्मशास्त्र और कानून (स्मृतियों की भूमिका)

मनुस्मृति

मनुस्मृति प्राचीन भारत का सबसे चर्चित धर्मशास्त्र है, जिसमें-

1.       सामाजिक नियम

2.       दंड व्यवस्था

3.       न्याय प्रक्रिया

4.       राजा और प्रजा के कर्तव्य

इन सभी का वर्णन मिलता है। यहाँ कानून का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि धर्म की पुनः स्थापना था।

क्योंकि दंड का लक्ष्य सुधार था, प्रतिशोध नहीं।

 

अन्य धर्मशास्त्र

  1.          याज्ञवल्क्य स्मृति
  2.         नारद स्मृति
  3.          बृहस्पति स्मृति

इन सभी में कानून को नैतिकता से जुड़ा हुआ माना गया, न कि केवल प्रशासनिक शक्ति के रूप में।

महाकाव्यों में धर्म बनाम कानून

महाभारत (धर्म की जटिलता)

महाभारत को धर्म का विश्वकोश कहा जाता है। इसमें स्पष्ट दिखाया गया है कि-

1.       कानून हमेशा धर्म के समान नहीं होता

2.       कभी-कभी नियमों का पालन भी अधर्म हो सकता है

भीष्म, युधिष्ठिर और कर्ण जैसे पात्र धर्म के नैतिक द्वंद्व को दर्शाते हैं। महाभारत का संदेश है,धर्म स्थिर नहीं, बल्कि परिस्थिति-सापेक्ष है।

 

रामायण (रामराज्य की अवधारणा)

रामायण में रामराज्य आदर्श शासन का प्रतीक है, जहाँ-

1-  राजा स्वयं कठोर नियमों का पालन करता है

2-  निजी सुख से ऊपर सार्वजनिक धर्म होता है

सीता त्याग का प्रसंग दर्शाता है कि राजा भी भावनाओं से ऊपर धर्म को रखता है।

अर्थशास्त्र: कानून और व्यवहारिक शासन

अर्थशास्त्र

कौटिल्य का अर्थशास्त्र अक्सर कठोर राजनीति का ग्रंथ माना जाता है, लेकिन इसमें भी धर्म सर्वोपरि है।
कौटिल्य स्पष्ट कहते हैं-

धर्म के बिना शासन टिक नहीं सकता।हालाँकि अर्थशास्त्र में दंड और गुप्तचरी का वर्णन है, फिर भी अंतिम लक्ष्य राज्य की स्थिरता और लोक-कल्याण है।

 

सत्य और धर्म पर आधारित न्याय प्रणाली

प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में-

1.       साक्ष्य

2.       शपथ

3.       नैतिक चरित्र

इन सभी को अत्यंत महत्व दिया जाता था।

झूठी गवाही को केवल अपराध नहीं, बल्कि अधर्म माना जाता था,जिसका दंड सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर था।

 

बौद्ध और जैन परंपरा में धर्म और कानून

बौद्ध दृष्टिकोण

सम्राट अशोक महान  के काल में धम्म को राज्य नीति बनाया गया।
धम्म का अर्थ था-

1.       अहिंसा

2.       करुणा

3.       सामाजिक न्याय

अशोक ने दंड की कठोरता कम कर नैतिक सुधार पर बल दिया।

 

जैन दृष्टिकोण

जैन परंपरा में कानून से ऊपर अहिंसा थी।
यहाँ धर्म का अर्थ था,किसी भी परिस्थिति में हिंसा न करना, चाहे कानून अनुमति देता हो।

 

क्या धर्म कानून से ऊपर था? (एक आलोचनात्मक दृष्टि)

यह कहना सरल होगा कि धर्म हमेशा न्यायपूर्ण था, लेकिन यह भी सच है कि-

1.       वर्ण व्यवस्था

2.       स्त्री अधिकार

3.       दास प्रथा

जैसी व्यवस्थाएँ धर्म के नाम पर वैध ठहराई गईं। इसलिए आधुनिक दृष्टि से धर्म-आधारित कानून पूर्णतः आदर्श नहीं था।

 

आधुनिक भारत और प्राचीन धर्म अवधारणा

आधुनिक भारतीय संविधान धर्म-निरपेक्ष है, लेकिन-

1.       न्याय

2.       कर्तव्य

3.       नैतिकता

जैसे मूल विचार प्राचीन धर्म अवधारणा से ही आए हैं।
कर्तव्य  धर्म की आधुनिक व्याख्या हैं।

 

निष्कर्ष

प्राचीन भारत में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि न्याय, शासन और सामाजिक संतुलन का सर्वोच्च सिद्धांत था। कानून धर्म का साधन था, स्वामी नहीं। हालाँकि समय के साथ धर्म की व्याख्या बदलती रही, फिर भी यह अवधारणा कि नैतिकता कानून से ऊपर है, आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

जब कानून न्यायहीन हो जाए, तब धर्म,अर्थात नैतिक विवेक ही समाज का अंतिम सहारा बनता है।

 



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