प्राचीन भारत में
मातृसत्तात्मक समाज के प्रमाण
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| प्राचीन भारत में मातृसत्तात्मक समाज के प्रमाण |
प्राचीन
भारत का सामाजिक इतिहास केवल राजवंशों और युद्धों की कथा नहीं है, बल्कि यह परिवार, उत्तराधिकार, धार्मिक आस्थाओं और लिंग-आधारित
भूमिकाओं की जटिल संरचनाओं का भी इतिहास है। आधुनिक विमर्श में प्रायः यह मान लिया
जाता है कि प्राचीन समाज सर्वत्र पितृसत्तात्मक थे। किंतु हालिया पुरातात्विक
खोजें, वैदिक ग्रंथों की पुनर्व्याख्या और
मानवशास्त्रीय अध्ययन इस धारणा को चुनौती देते हैं। अनेक साक्ष्य यह संकेत करते
हैं कि प्राचीन भारत में मातृसत्तात्मक
या कम से कम मातृवंशीय तत्व विद्यमान थे,विशेषकर धार्मिक प्रतीकों, पारिवारिक संरचनाओं और
स्त्री-केन्द्रित सांस्कृतिक परंपराओं में।
आज का यह ब्लॉग
उसी जटिल यथार्थ का गहन अध्ययन प्रस्तुत
करता है,जहाँ मातृसत्ता को पूर्ण शासन के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभुत्व, वंश परंपरा और धार्मिक केंद्रीयता के रूप में देखा जाता है।
मातृसत्ता बनाम मातृवंशीय व्यवस्था
सबसे पहले
यह समझना आवश्यक है कि मातृसत्ता और मातृवंशीय व्यवस्था समान नहीं हैं।
मातृसत्ता- वह सामाजिक व्यवस्था जिसमें सत्ता, निर्णय-निर्माण और संसाधनों पर
नियंत्रण महिलाओं के हाथों में हो।
मातृवंशीयता- वह व्यवस्था जिसमें वंश, संपत्ति या पहचान माँ की ओर से
निर्धारित होती है, भले ही राजनीतिक सत्ता पुरुषों के
पास हो।
प्राचीन
भारत के संदर्भ में उपलब्ध साक्ष्य अधिकतर मातृवंशीय और मातृकेन्द्रित समाज की ओर संकेत करते हैं, न कि सर्वथा मातृसत्तात्मक राज्य
संरचना की ओर।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता और मातृदेवी परंपरा
प्राचीन
भारत में मातृसत्तात्मक संकेतों का सबसे सशक्त प्रमाण सिंधु-सरस्वती (हड़प्पा) सभ्यता से प्राप्त होता है। खुदाई में
मिली असंख्य मृण्मूर्तियाँ एक ऐसी देवी को
दर्शाती हैं जिसे विद्वान “मातृदेवी” या मानते हैं। इन मूर्तियों में
स्त्री को उर्वरता, सृजन और संरक्षण के प्रतीक के रूप
में चित्रित किया गया है।
हड़प्पा
स्थलों पर इन देवी-मूर्तियों की व्यापक उपस्थिति यह दर्शाती है कि धार्मिक जीवन
में स्त्री-तत्व केन्द्रीय था और समाज की कल्पना में जीवन का स्रोत स्त्री मानी जाती थी ।
इसके
अतिरिक्त, कुछ पुरातत्वविदों का मानना है कि
इन मूर्तियों का घरेलू पूजा-स्थलों में पाया जाना स्त्री-प्रधान पारिवारिक धार्मिक
संरचना की ओर संकेत करता है, जहाँ परिवार
की आध्यात्मिक धुरी स्त्री थी।
स्त्री की बौद्धिक और आध्यात्मिक केंद्रीयता (वैदिक
काल)
ऋग्वैदिक
काल को प्रायः पितृसत्तात्मक कहा जाता है, किंतु स्वयं ऋग्वेद में स्त्रियों की भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक दिखाई
देती है। अनेक स्त्रियाँ ऋषिका के रूप में मंत्रद्रष्टा थीं,जैसे घोषा, लोपामुद्रा, अपाला और विश्ववारा। स्त्रियों द्वारा रचित मंत्र इस
तथ्य का प्रमाण हैं कि ज्ञान और आध्यात्मिक अधिकार केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थे ।
कुछ
विद्वानों का मत है कि यह स्त्री-ज्ञान परंपरा किसी प्राचीन मातृकेन्द्रित
सांस्कृतिक अवशेष का संकेत हो सकती है, जो बाद के कालों में क्रमशः सीमित होती चली गई।
विवाह, उत्तराधिकार और स्त्री-धन की अवधारणा
वैदिक और
उत्तर-वैदिक साहित्य में स्त्री-धन
की अवधारणा मिलती है, जिसके अंतर्गत स्त्री को विवाह के
समय या बाद में प्राप्त संपत्ति पर उसका अधिकार होता था। यह संपत्ति उसकी
व्यक्तिगत मानी जाती थी, न कि पति या ससुराल की ।
यद्यपि समाज
पूर्णतः मातृवंशीय नहीं था, फिर भी स्त्री-धन जैसी व्यवस्थाएँ
यह दर्शाती हैं कि स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता और पहचान को मान्यता प्राप्त थी—जो मातृकेन्द्रित सोच की ओर संकेत
करती है।
लोक परंपराएँ और आदिवासी समाज
भारत के
अनेक आदिवासी समाजों में आज भी मातृवंशीय परंपराएँ जीवित हैं। उदाहरणस्वरूप, खासी, गारो और जयंतिया समाजों में वंश और
संपत्ति का उत्तराधिकार माँ की ओर से चलता है। यद्यपि ये समाज आधुनिक काल में
विद्यमान हैं, मानवशास्त्रीय दृष्टि से इन्हें
प्राचीन सामाजिक संरचनाओं का जीवित अवशेष माना जाता है ।
इन समाजों
में पारिवारिक निर्णयों में स्त्री की भूमिका केंद्रीय होती है, जो यह संकेत देती है कि भारतीय
उपमहाद्वीप में मातृवंशीयता कोई अपवाद नहीं, बल्कि ऐतिहासिक निरंतरता का हिस्सा रही है।
मातृदेवी से महादेवी तक (धार्मिक निरंतरता)
प्राचीन
मातृदेवी परंपरा का रूपांतरण आगे चलकर दुर्गा, काली, पार्वती जैसी महादेवियों में दिखाई देता है। शक्ति-उपासना की
यह परंपरा स्त्री-तत्व को केवल सृजनकर्ता ही नहीं, बल्कि संरक्षक और संहारक शक्ति के रूप में भी प्रतिष्ठित
करती है।
धार्मिक
इतिहासकारों का मानना है कि यह देवी-प्रधान परंपरा प्राचीन मातृकेन्द्रित सामाजिक
स्मृति का सांस्कृतिक रूपांतरण है, जो समय के साथ पौराणिक ढाँचे में ढल गई ।
पितृसत्ता का उदय और मातृतत्व का ह्रास
उत्तर-वैदिक
काल और विशेषकर धर्मसूत्रों के काल में समाज अधिक स्पष्ट रूप से पितृसत्तात्मक
होता गया। उत्तराधिकार, विवाह और सामाजिक नियमों में
पुरुष-प्रधानता बढ़ी। फिर भी, यह परिवर्तन अचानक नहीं, बल्कि एक दीर्घ सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम था।
कुछ आधुनिक
अध्ययनों का मत है कि कृषि, निजी संपत्ति और राज्य-व्यवस्था के
सुदृढ़ होने के साथ पितृसत्ता का विस्तार हुआ, जबकि उससे पहले के समाज अपेक्षाकृत अधिक
स्त्री-केन्द्रित थे ।
वैश्विक तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य और भारत
विश्व के
अन्य प्राचीन समाजों,जैसे अनातोलिया का चातालह्यूक (आज के तुर्की क्षेत्र में स्थित एक बहुत पुरानी बस्ती थी),में हालिया डीएनए अध्ययनों ने मातृवंशीय संरचनाओं की
पुष्टि की है। इससे यह समझ विकसित होती है कि मातृकेन्द्रित समाज मानव इतिहास में
एक सामान्य अवस्था हो सकते हैं, न कि अपवाद।
यह वैश्विक परिप्रेक्ष्य भारतीय संदर्भ को और अधिक विश्वसनीय बनाता है ।
चातालह्यूक के डीएनए अध्ययनों ने दिखाया कि बहुत पुराने समय में भी ऐसे समाज थे जहाँ परिवार और समाज की जड़ें माँ की ओर से चलती थीं। यह मानव इतिहास को देखने का नजरिया और व्यापक बनाता है।
चातालह्यूक
में डीएनए से क्या पता चला?
वैज्ञानिकों
ने चातालह्यूक में मिले मानव अवशेषों का डीएनए विश्लेषण किया। इससे कुछ अहम बातें
सामने आईं-
1.
मातृवंशीय संकेत- घरों में दफन लोगों के डीएनए में
महिलाओं की ओर से रिश्ते ज़्यादा मिलते हैं। यानी परिवार की पहचान माँ के वंश से
जुड़ी थी।
2.
महिलाएँ केंद्र में थीं- ऐसा
लगता है कि महिलाएँ अपने ही घर या समुदाय में रहती थीं, जबकि पुरुष विवाह के बाद दूसरे
घर/समुदाय में आते थे।
3. सामाजिक बराबरी- कब्रों और घरों में पुरुष-महिला के बीच बहुत बड़ा भेद नहीं दिखता, जिससे लगता है कि समाज अपेक्षाकृत समानता-आधारित था।
निष्कर्ष
प्राचीन
भारत में मातृसत्तात्मक समाज के प्रमाण प्रत्यक्ष राजनीतिक सत्ता के रूप में भले
ही सीमित हों, किंतु धार्मिक प्रतीकों, सामाजिक संरचनाओं, वैदिक स्त्री-ज्ञान परंपरा और
आदिवासी मातृवंशीय व्यवस्थाओं में इसके स्पष्ट संकेत मिलते हैं। यह कहना अधिक
समीचीन होगा कि प्राचीन भारत का समाज एकांगी पितृसत्तात्मक नहीं, बल्कि समय-समय पर मातृकेन्द्रित और पितृकेन्द्रित
तत्वों का मिश्रण रहा है।
इस गहन
अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की भूमिका केवल घरेलू नहीं थी; वह सृजन, ज्ञान, धर्म और सामाजिक निरंतरता की धुरी रही है। आधुनिक समाज के
लिए यह इतिहास एक महत्वपूर्ण संदेश देता है,कि समानता
और संतुलन भारतीय परंपरा के मूल में निहित रहे हैं।

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