google.com,pub-7156863209947891,DIRECT,fec0942fa0 नालंदा से पहले तक्षशिला में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अलग नियम

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नालंदा से पहले तक्षशिला में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अलग नियम

 

नालंदा से पहले तक्षशिला में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अलग नियम 


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नालंदा से पहले तक्षशिला में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अलग नियम 

प्राचीन भारत को विश्व का प्रथम “ग्लोबल नॉलेज हबकहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब यूरोप के अधिकांश क्षेत्र बुनियादी शिक्षा से भी वंचित थे, तब भारत में तक्षशिला जैसा अंतरराष्ट्रीय शिक्षा-केंद्र सक्रिय था। नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं शताब्दी ई.) से सदियों पहले ही तक्षशिला (लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व) ने विदेशी छात्रों के लिए विशिष्ट नियम, प्रवेश मानदंड और अकादमिक अनुशासन विकसित कर लिया था। आज का यह ब्लॉग इसी ऐतिहासिक तथ्य का गहन अध्ययन एवं विश्लेष्ण प्रस्तुत करता है। 

विश्व का प्रथम अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय (तक्षशिला)

तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में) गांधार की राजधानी के रूप में स्थित था और एशिया, मध्य-पूर्व व भूमध्यसागर क्षेत्र के व्यापार मार्गों के संगम पर अवस्थित था। यही भौगोलिक स्थिति इसे स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय बनाती थी।
इतिहासकारों के अनुसार, तक्षशिला में 10,500 से अधिक छात्र और लगभग 2,000 आचार्य थे, जिनमें बड़ी संख्या विदेशी विद्यार्थियों की थी

नालंदा से पहले तक्षशिला के नियम क्यों अलग थे?

नालंदा एक संगठित महाविहार था, जबकि तक्षशिला एक विकेन्द्रित गुरु-कुल आधारित विश्वविद्यालय था। यही कारण था कि यहां छात्रोंविशेषकर विदेशी छात्रोंके लिए अलग और अधिक व्यावहारिक नियम बनाए गए।

मुख्य कारण:-     

(क)- विभिन्न देशों की भाषाएँ और संस्कृतियाँ    

(ख)-  अलग-अलग ज्ञान परंपराएँ (ग्रीक, फारसी, बेबीलोनियन)

(ग)-   आवास और जीवन-शैली में विविधता

(घ)- राजनीतिक व कूटनीतिक संवेदनशीलता

अंतरराष्ट्रीय छात्रों की उत्पत्ति और क्षेत्र

तक्षशिला में अध्ययन करने वाले विदेशी छात्र निम्न क्षेत्रों से आते थे:-

a- बेबीलोनिया (आधुनिक इराक)

b- यूनान (ग्रीस)

c- मिस्र

d- सीरिया

e- अरब

f- चीन

g- एशिया माइनर (तुर्की)

इन छात्रों का उल्लेख बौद्ध जातक कथाओं और अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है

विदेशी छात्रों के लिए विशेष प्रवेश नियम

1. न्यूनतम आयु और पूर्व शिक्षा-

  a- प्रवेश की न्यूनतम आयु 16 वर्ष निर्धारित थी

    b-  छात्र को अपने देश या क्षेत्र में प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करनी होती थी

  c- विदेशी छात्रों के लिए स्थानीय संदर्भों की परीक्षा ली जाती थी

यह नियम इस बात को दर्शाता है कि तक्षशिला ओपन एडमिशननहीं बल्कि मेरिट-आधारित चयन प्रणाली अपनाता था

2. आचार्य को चयन का पूर्ण अधिकार-

तक्षशिला की सबसे अनूठी विशेषता यह थी कि:-

a- हर आचार्य को अपने शिष्य स्वयं चुनने का अधिकार था

b- विदेशी छात्र तभी स्वीकार किए जाते थे जब वे विषय-विशेष में योग्यता सिद्ध करें

c- जाति, राष्ट्र या नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं

यह व्यवस्था नालंदा से अलग थी, जहां बाद में संस्थागत प्रवेश प्रणाली विकसित हुई।

 

भाषा और अध्ययन से जुड़े विशेष नियम

1. संस्कृत अनिवार्यता नहीं

नालंदा में जहाँ संस्कृत और पालि अनिवार्य थीं, वहीं तक्षशिला में:-

a- विदेशी छात्रों को संस्कृत का प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया जाता था

b- बहस, संवाद और व्याख्या की बहुभाषी परंपरा थी

c- आचार्य छात्रों की भाषा-समस्या के अनुसार शिक्षण पद्धति बदलते थे

2. वाद-विवाद आधारित शिक्षण

तक्षशिला की शिक्षा:-

a- संवाद

b- शास्त्रार्थ

c- व्यावहारिक परीक्षण

पर आधारित थी। विदेशी छात्रों को भारतीय तर्क-पद्धति (न्याय) से परिचित कराया जाता था 

पाठ्यक्रम में विदेशी छात्रों के लिए लचीलापन

तक्षशिला में 64 से अधिक विषय पढ़ाए जाते थे, जिनमें विदेशी छात्रों के लिए विशेष रुचि वाले विषय शामिल थे:-

चिकित्सा (आयुर्वेद और शल्य-चिकित्सा)

सैन्य विज्ञान

राजनीति और कूटनीति

खगोल विज्ञान

व्यापार और लेखांकन

विशेष बात यह थी कि पाठ्यक्रम की अवधि निश्चित नहीं होती थी,अध्ययन तब तक चलता था जब तक आचार्य संतुष्ट न हो जाएं

अनुशासन और आचरण नियम

विदेशी छात्रों के लिए कठोर लेकिन व्यावहारिक नियम थे:-

स्थानीय सामाजिक परंपराओं का सम्मान

राजनीतिक या धार्मिक हस्तक्षेप से दूरी

गुरुकुल जीवन में आत्मअनुशासन

वाद-विवाद में मर्यादा का पालन

इन नियमों का उल्लंघन करने पर छात्र को शिक्षा से वंचित किया जा सकता था।

आवास और जीवन-शैली के विशेष नियम

तक्षशिला कोई एक परिसर नहीं था। विदेशी छात्र:-

आचार्य के निवास के समीप रहते थे

स्थानीय परिवारों के साथ रहकर संस्कृति सीखते थे

भोजन, वेश-भूषा और दैनिक जीवन में भारतीय परंपराओं का पालन करते थे

यह व्यवस्था आज के स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम की प्राचीन मिसाल है।

नालंदा बनाम तक्षशिला (विदेशी छात्रों की दृष्टि से तुलना)

तक्षशिला और नालंदा दोनों ही प्राचीन भारत के विश्वविख्यात शिक्षा-केंद्र थे, किंतु विदेशी छात्रों के लिए उनकी व्यवस्था भिन्न थी। तक्षशिला में प्रवेश गुरु-केंद्रित था, जहाँ विदेशी छात्र अपनी योग्यता के आधार पर किसी आचार्य द्वारा चुने जाते थे। यहाँ भाषा, पाठ्यक्रम और अध्ययन-अवधि में पर्याप्त लचीलापन था, जिससे विभिन्न संस्कृतियों के छात्र सहज रूप से समायोजित हो पाते थे। इसके विपरीत, नालंदा एक संगठित महाविहार था, जहाँ प्रवेश प्रक्रिया अधिक औपचारिक, भाषा-केंद्रित (संस्कृत/पाली) और नियमबद्ध थी। विदेशी छात्रों के लिए नालंदा में अनुशासन सख्त, किंतु अकादमिक संरचना अधिक सुव्यवस्थित थी।

वैश्विक प्रभाव और विरासत

तक्षशिला से शिक्षित विदेशी छात्र:-

अपने देशों में विश्वविद्यालयों की स्थापना

भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रसार

चिकित्सा, राजनीति और दर्शन में भारतीय दृष्टिकोण का प्रचार

यही कारण है कि तक्षशिला को विश्व का पहला अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय कहा जाता है

निष्कर्ष

नालंदा से पहले तक्षशिला में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए बनाए गए नियम यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन भारत न केवल ज्ञान-उत्पादक था, बल्कि ज्ञान-प्रबंधन और वैश्विक शिक्षा नीति में भी अग्रणी था। तक्षशिला की लचीली, समावेशी और व्यावहारिक व्यवस्था आज की आधुनिक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के लिए भी प्रेरणास्रोत है।

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